इक्कीसवीं सदी के हिंदी सिनेमा और साठोत्तरी हिंदी ग़ज़ल में व्यक्त नारी चेतना
Abstract
इस शोध का उद्देश्य यही है कि नारी की समाज में क्या भूमिका थी, क्या है और क्या होनी चाहिए; नारी की क्या स्थिति थी, क्या है और क्या होनी चाहिए। अनेक शासक आए और चले गए; अनेक शासन-व्यवस्थाएँ आईं और चली गईं, लेकिन स्त्री एक कदम बढ़ती है तो उसे दो कदम पीछे खींच लिया जाता है। समाज की प्रगति का सही से तभी मिलाकर चलने में है कि कोई आगे जाने में प्रगति हो, न कि कोई किनारे पड़ा हुआ हो। साठोत्तरी हिंदी ग़ज़लकारों ने अपनी कलम से स्त्री की सुंदरता का वर्णन ही नहीं किया है, बल्कि स्त्री की भौतिक उपस्थिति समाज के सामने रखी है। एक नारी किस प्रकार पैदा होने से पहले ही संकट में आ जाती है और यदि जन्म ले भी लेती है तो जीवन में संकट की लंबी श्रृंखला उसके साथ चलती रहती है। यह देखकर समाज की स्थिति पर बहुत तरस आता है कि एक ओर तो हम समानता की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर हम ही नहीं चाहते कि प्रत्येक व्यक्ति समाज में बराबर हो।
इक्कीसवीं सदी की अनेक हिंदी फिल्मों में नारी से संबंधित इन विसंगतियों पर प्रहार किया गया है। इस शोध-पत्र में इक्कीसवीं सदी की कुछ फिल्मों और साठोत्तरी हिंदी ग़ज़लकारों के कुछ शेर संदर्भ के रूप में रखे गए हैं, जो कि भ्रूण-हत्या, भेदभाव, अधूरी स्वतंत्रता, दहेज-उत्पीड़न, अपमान और मजबूरी जैसी महिलाओं के जीवन में आने वाली अनेक समस्याओं को दर्ज करते हैं। नारी के साथ ये सभी समस्याएँ समाज का सच हैं, ठीक उसी तरह यह भी सच है कि नारी सबल है, सक्षम है और समर्थ है। इन सभी समस्याओं को दूर करने में भी और अपने लिए बराबरी का स्थान बनाने में भी।